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*मुन्सी प्रेमचंद जी की एक सुंदर कविता* _ख्वाहिश नहीं मुझे_ _मशहूर होने की, _आप मुझे पहचानते हो_ _बस इतना ही ...
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"पसंद आये तो एक स्माइल दीजियेगा जिसने भी लिक्खा उम्दा लिक्खा यह नदियों का मुल्क है, पानी भी भरप...
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*कंद-मूल खाने वालों से* मांसाहारी डरते थे।। *पोरस जैसे शूर-वीर को* नमन 'सिकंदर' करते थे॥ *चौदह वर्षों तक खूंखारी* वन में ...


























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